बिके जमीर वाली कीर्तन मंडली का युगपुरुष नेहरू जी और मोदी जी की बेमेल तुलना का स्याह सच

देश के इतिहास से नावाकिफ वर्ग, बजबजाती संघी विचारधारा के समर्थक, सरकारी एजेंसियों के खौफ में पत्रकारिता को सरकार के चरणों में रखनेवाले मीडिया घराने, सरकारी पैसों की खनक के आगे नतमस्तक पत्तलकार, लोकतंत्र के चीरहरण पर चुप्पी साधनेवाले तथाकथित राजनीतिक विश्लेषकों ने 10 जून से चीख-चीखकर देशभर में शोर मचा रखा है कि उनके नॉन बायोलॉजिकल मोदी जी ने बतौर निर्वाचित प्रधानमंत्री, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का सबसे अधिक समय पीएम रहने का कीर्तिमान ध्वस्त कर दिया है।

एक भक्तिकाल मध्यकालीन युग में 1375 ईस्वी से 1700 ईस्वी का था जिसे गर्व से भारत का स्वर्णकाल भी कहा जाता है। इस दौर ने रामानंद, कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास, गुरु नानक, रविदास, नामदेव, नंददास, कृष्णदास, मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु, रसखान, मलिक जायसी, एकनाथ, तिरुवल्लुवर, मलूक आदि महान संतों को हमारे समाज को दिया था जिन्होंने हमारी जीवन शैली, भक्ति और आस्था को नयी समझ दी थी।

आज एक नए प्रकार का भक्तिकाल चल रहा है जिसमें सबसे नाकाबिल चेहरे को देश की प्रत्येक समस्याओं को हल करने वाला जतलाया जा रहा है, रोजगार उपलब्ध कराने में नाकाम पीएम द्वारा उन्हें मज़बूरी में मुफ़्त राशन उपलब्ध कराने को बुद्धिहीन भक्तों द्वारा उन्हें जनता का माई बाप साबित किया जा रहा है, एक अनपढ़ से परीक्षा पर चर्चा करवाई जा रही है, औरंगजेब के बाद अपने सीएम तथा पीएम कार्यकाल में विकास के नाम पर सर्वाधिक मंदिर ध्वस्त करवाने वाले को हमारे आराध्य भगवान श्री राम को मंदिर दिलाने वाला बताया जा रहा है।

एक कुंठित सोच वाले को पंडित नेहरू जैसे विराट व्यक्तित्व के समक्ष नहीं बल्कि ऊपर बतलाया जा रहा है। जिस तरह से उस मध्यकालीन भक्ति काल ने हमें पीढ़ियों गौरवान्वित रखा है, उसी तरह से सड़ी मानसिकता वाले गोबरभक्तों का यह भक्तिकाल हमें पीढ़ियों शर्मिंदा करता रहेगा। 

इन बुद्धिहीनों का कुतर्क है कि उनके अवतारी चचा ने बतौर निर्वाचित प्रधानमंत्री, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सर्वाधिक समय पीएम रहने वाला रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया है। इसके लिए इन जाहिलों की जमात ने 1952 के पहले आमचुनाव को केंद्रबिंदु मानकर नेहरू जी को 4398 दिनों तक का अनवरत पीएम माना है और अपने विष गुरु को 10 जून को इस रिकॉर्ड से उस पार मान सर्वाधिक समय तक का निर्वाचित प्रधानमंत्री घोषित कर दिया।

इन बैल बुद्धि वालों से पूछा जाए कि 1952 में पंडित नेहरू के नेतृत्व में बनी सरकार को पैमाना बता रहे हो तो क्या 1947 में जिस संविधान सभा का गठन संविधान निर्माण करने, नए विधानमंडल गठन करने, देश को गणतंत्र बनाने हेतु किया गया था वह निर्वाचित नहीं थी? क्या वह तब की संसद के रूप में कार्यरत नहीं थी? क्या श्रद्धेय नेहरू जी उस निर्वाचित संविधान सभा के प्रधानमंत्री नहीं थे?

दिमाग से पैदल मूर्खो, अगर इस अकाट्य तथ्य को नकारोगे तो तुम्हारे ही कुल के श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी केंद्रीय मंत्री नहीं कहलाएंगे जो 15 अगस्त 1947 से 06 अप्रैल 1950 तक नेहरू जी की राष्ट्रीय सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री थे, साथ ही महान स्वतंत्रता सेनानी, जन्मजात कांग्रेसी, किसान नेता, लौह पुरुष, तात्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल जिन्होंने संघ पर प्रतिबंध लगाया पर जिन्हें संघी देश के पहले प्रधानमंत्री न बनने देने के लिए झूठ गढ़ते हुए गांधी जी और नेहरू जी को कसूरवार ठहराते हैं वह भी इनकी उस थ्योरी के अनुसार भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री नहीं कहलाएंगे। कहां से इतना दोगलापन लाते हो?

सुनो, वैचारिक गंदगी फैलाने वालो, कयामत तक और भारत देश के अस्तित्व तक प्रकांड विद्वान, स्वप्नदृष्टा, कर्मयोगी, करिश्माई नेतृत्व, अजातशत्रु, आत्मनिर्भर भारत के असली नींव धारी, विश्वव्यापी स्वीकारोक्ति वाले दुनिया के लाल, भारत के असल रत्न पंडित जवाहर लाल नेहरू की तुलना के लायक भी नरेंद्र दामोदर दास मोदी जैसे औसत दर्जे से भी कम व्यक्ति जिनकी अनेक नकारात्मक छवि सार्वजनिक हैं कभी नहीं हो सकते है।

सत्ता की हनक पर जिस बेशर्मी से इस षड्यंत्री सरकार ने अपनी वैचारिक गंदगी आज से 62 वर्ष पूर्व दिवंगत हो चुके देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू पर अनवरत फेंकी, उनकी चरित्र हत्या की, उनकी अमिट उपलब्धियों को मिटाने का कुत्सित प्रयास किया, अपनी हर नाकामी को उनके मत्थे मढ़ा यह सोचकर कि ऐसा कर वे भारतीय जनमानस से पंडित नेहरू की छवि को हमेशा के लिए मलिन कर देंगे जिससे आनेवाली पीढ़ियां नेहरूजी को देश का सबसे बड़ा खलनायक मानेंगी।

अरे कुंठित सोच वालो जिस पंडित नेहरू को तुम्हारे आका अंग्रेज नहीं झुका सके, उनकी पाक छवि को मलिन नहीं कर सके उन्हें तुम पेंशनधारी के वंशज भारतीय समाज से मिटा सकोगे? तुम्हारी पीढ़ियाँ खत्म हो जाएंगी पर नेहरू जी को सच्चे भारतीय की स्मृति से नहीं निकाल सकती। पंडित नेहरू शारीरिक रूप से भले साथ न हों पर विचारधारा के रूप में वह अजर अमर हैं। देश आज भी पंडित नेहरू की बनाई नीतियों पर ही चल रहा है भले ही तुम नाम बदलने की सनक में इससे इंकार करते रहो।

आज भी तुम्हे हर विदेशी दौरों पर गांधी और नेहरू के भारत से ही पहचान मिलती है। हर विदेशी मेहमान गांधी जी और नेहरू जी को ही नमन करता है। सीधी चुनौती है किसी विदेशी मेहमान को अपने कुल वालों की समाधि पर ले जाकर दिखाओ।

मोदी जी, कभी जीवन में सकारत्मक सोच भी अपना लिया करिए। आप जिस महान गुजरात राज्य से आते हैं वहीं से नेहरू जी के गुरु राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी और नेहरू जी के अभिन्न, आजन्म साथी सरदार वल्लभ भाई पटेल जी भी आते हैं जिन्होंने जवाहर लाल को महान नेहरू बनाने में अपनी भी ऊर्जा लगाई है। आपसे पहले ही गुजरात पावन, समृद्ध राज्य रहा है, उसने अनेक विभूतियाँ देश को दी हैं। श्री कृष्ण की द्वारिका नगरी सदियों से गुजरात की धार्मिक प्रतिबद्धता को गौरवान्वित करती आ रही है।

अपनी उद्यमशीलता के चलते वह काफी पहले से औद्योगिक रूप से विकसित हो चुका था, गुजरात की पहचान एक धर्मपरायण समाज वाली रही है जहां के लोग बेहद शांतिप्रिय और व्यापारिक बुद्धि वाले होते हैं, दानवीरता भी इनके जीन में रही है पर आपके बतौर गुजरात मुख्यमंत्री और बतौर देश के प्रधानमंत्री कड़वा सच यह है कि वही गुजरात की पहचान खतरे में दिखाई दे रही है, जिस गुजरात की गर्वित पहचान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, सरदार पटेल साहब, विक्रम साराभाई, डॉ. जीवराज मेहता जैसे नगीनों से रही है आज उस गुजरात की पहचान नरेंद्र मोदी, अमित शाह जैसे उन राजनीतिज्ञों से है जिनके लिए किसी भी स्तर पर सत्ता ही जरूरी है, सत्ता की नोंक पर संस्थाओं पर कब्जे की जिनकी छवि है।

मुकेश अंबानी और गौतम अदाणी जैसे उन धनपिपासु उद्योगपतियों से है जो सरकारी मशीनरी के जरिए देश के सारे आर्थिक संसाधनों पर अपना एकाधिकार चाहते हैं। जिस तरह से मोदी, शाह के लिए कोई राजनीतिक शुचिता मायने नहीं रखती उसी तरह से इन दोनों धन्नासेठों के लिए आर्थिक शुचिता कोई मायने नहीं रखती है। जैसे उन गुजराती नगीनों के चलते आम गुजरातियों की ख्याति भी खूब थी वैसे ही इन चारों गुजरातियों की कारगुजारियों से आम गुजरातियों की ख्याति खतरे में है, कई लोगों को शर्मिंदगी तक होती है। 

यह स्थापित तथ्य है कि किन्हीं भी दो व्यक्तित्वों की तुलना के कई मानदंड होते हैं जैसे तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक परिस्थितियां, नेतृत्व क्षमता, उसकी स्वीकार्यता, विदेशी सरकारों का सरकार और मुखिया पर समग्र नजरिया, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का सरकार की भिन्न नीतियों पर नजरिया, स्वतंत्र मीडिया का भिन्न पैमानों पर नजरिया, जनता के लिए उनकी उपलब्धता। क्या इन सारे मापदंडों की कसौटियों पर दोनों को कसा गया या सतही रूप से तुलना की औपचारिकता पूरी की गई है कि ज्यादा समय सत्ता में रहने की वजह से मोदी जी, नेहरू जी से ऊपर हो गए हैं?

साफ है कि चाटुकारों की पिद्दी जमात ने आका की झूठी शान में कसीदे पढ़ दरबार में अपने नंबर बढ़ाने की ही कवायद भर की है। दरअसल कोई औसत बुद्धि वाला भी नेहरू जी तथा मोदी जी की तुलना का जोखिम नहीं ले सकता क्योंकि दोनों की तुलना ही नहीं है। एक ओर जहां नेहरू जी आज़ादी की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस की विचारधारा के अग्रिम योद्धा थे, 09 बार में कुल 3259 दिन अर्थात 09 वर्ष अंग्रेजों की जेल में कैद रहे, दूसरी ओर मोदी जी उस विचारधारा से आते हैं जिसने स्वतंत्रता आंदोलन का खुला विरोध किया।

उस विचारधारा ने स्वतंत्रता सेनानियों की जासूसी कर उन्हें गिरफ्तार कराया, जो देश के विभाजन के लिए भी मुस्लिम लीग के बराबर जिम्मेदार है, जो नेताजी के आजाद हिंद फौज के गठन की विरोधी थी, जिनके एक वैचारिक पूर्वज अंग्रेजों की पेंशन पर निर्भर थे, अलहदा है कि इन खोखले राष्ट्रभक्तों की हैसियत नहीं है कि साफ बता सकें सावरकर किस काम के एवज में अंग्रेजों से पेंशन पाने के पात्र थे ? ऐसे में नेहरू जी तथा मोदी जी में कैसे तुलना हो सकती है ?

आज़ादी के बाद एक लुटे-पिटे, विभाजित देश की कमान संभालते ही जहां नेहरू जी देश को बुनियादी मजबूती देने हेतु प्रणप्राण से जुट गए, भारतीय लोकतंत्र को मजबूत स्तंभ बनाने में अपने को खपा दिया, जिससे दुनिया को भारत के रूप में सबसे बड़ा लोकतंत्र मिला। कंगाल और आश्रित देश को आर्थिक मज़बूती देते हुए उद्योगों का जाल बिछवाया, औद्योगिक क्रांति के जरिए 42 पीएसयू राष्ट्र को समर्पित किया, जिसके फलस्वरूप नौकरियों का सृजन हुआ।

बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से मयस्सर देश में एम्स जैसे विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधा दिलायी। देश में वैज्ञानिक सोच को तरजीह देते हुए विज्ञान के हर क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की ठोस नींव रखी। संसदीय लोकतंत्र में सदैव ही विपक्ष को पूरा सम्मान तथा अवसर दिया।

विश्व पटल पर भारत की मजबूत उपस्थिति, पकड़ तथा निष्पक्ष स्टैंड हेतु हमेशा सजग रहे, नेहरू जी के सद्प्रयासों से ही गुट निरपेक्ष आंदोलन अस्तित्व में आया, जिसने दो ध्रुवीय विश्वशक्ति के परे जाकर किसी खेमे में नजर आने की बजाए दोनों से समान दूरी बनाते हुए निष्पक्ष गोलबंदी की अवधारणा को बलवती किया। खेलों में भारत को अग्रिम पंक्ति में लाने हेतु 1951 में ही भारत में एशियाई खेलों की मेजबानी कर दिखाई थी।

कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हेतु बड़े बांधों का निर्माण करवाया। रोजगारोन्मुखी शिक्षा हेतु आईआईटी, आईआईएम, एनआईटी, आदि का जाल बिछवाया, अंतरिक्ष विज्ञान को गति प्रदान करने हेतु इसरो, डीआरडीओ और बीएआरसी का गठन करवाया। यह सारे लगभग असंभव से दिखने वाले कार्य भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में जो आर्थिक रूप से भी कमज़ोर था और नया नया ही आज़ाद मुल्क बना था, जमीन पर उतारने किसी साधारण व्यक्ति के वश की बात कतई नहीं थी, यह सिर्फ नेहरू जी जैसे विराट व्यक्तित्व के बूते की ही बात थी, क्योंकि वह बेहद सकारत्मक सोच और समझ वाले गणक थे। 

दूसरी तरफ 2014 में मोदी जी के हिस्से में हर क्षेत्र में मजबूत भारत आया। मेरा मानना है कि 2004 से 2014 की यूपीए सरकार दरअसल 1947 से 1964 की नेहरू सरकार के बाद सबसे सफल कामकाजी सरकार थी, जिसने हर पैमाने पर भारत को विकासशील देश से विकसित देश की पटरी पर लाने का भगीरथ प्रयास किया था।

मनमोहन सिंह जी तथा सोनिया गांधी जी की जोड़ी ने हर क्षेत्र में देश को अग्रणी बनाने अपने को झोंक दिया था, सरकार की यही नीति कई विघ्नसंतोषियों को नागवार गुजरी और वे इस कर्मयोगी सरकार को गिराने प्रपंचों में लग गए। भले ही यूपीए सरकार को पदच्युत करने हेतु जिन षड्यंत्रों का उपयोग किया गया वह इतिहास में दर्ज है पर उसके गुनाहगार कभी सुखी नहीं रहेंगे क्योंकि उन्होंने एक खास विचारधारा की सरकार लाने हेतु झूठ का वह ताना-बाना बुना जो असल में था ही नहीं।

जिसने देश को विकास के हर मापदंड में बहुत पीछे छोड़ दिया क्योंकि देश की भावुक जनता ने इनके कुचक्रों में उलझकर यूपीए सरकार को बुरी तरह से हराकर सत्ता से बेदखल कर दिया था। वैसे तो उसके अनेक गुनाहगार हैं पर विशेष रूप से विनोद राय, अन्ना हजारे, रविशंकर, रामदेव, वीके सिंह, किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, कुमार विश्वास, आदि अक्षम्य दोषी हैं, कुछ लोगों को अपने पापों का इल्म हो गया तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी गलती स्वीकारी और माफी भी मांगी है।

उस समय की मेनस्ट्रीम मीडिया ने भी अपनी आजादी का लाभ उठाकर यूपीए सरकार को खूब कटघरे में खड़ा किया था, आज उस दौर के पत्रकार कहां है, उनके साथ इस सरकार ने क्या किया यह भी देश बखूबी जानता है। खैर, हर गुनाहगार की सजा मुक़र्रर है, समय पर इन्हें भी अवश्य मिलेगी पर इनके झांसे में आई जनता तो 2014 से ही मोदी सरकार को लाने की सज़ा अनवरत भुगत रही है, कितना भुगतान शेष है वो समय के हाथों में है। 

एक मजबूत, समृद्ध राष्ट्र को कैसे चहुमुंखी तबाह किया जा सकता है वह एक आत्ममुग्ध और अहंकारी मुखिया के क्रियाकलापों से बेहतर समझा जा सकता है। अव्वल तो उनकी शैक्षणिक योग्यता पर ही बड़ा सा प्रश्नचिन्ह है क्योंकि उसे बार-बार छिपाया जाता है जिससे संदेह और गहरा जाते हैं। इन बारह वर्षों के साहेब के कार्यकाल में देश की मज़बूत अर्थव्यवस्था कैसे भरभरा रही है सभी देख रहे हैं।

जिन पीएसयू को पूर्ववर्ती सरकारों ने देश की जनता के हवाले रखा था उन पीएसयू को अपने चहेते उद्योगपति मित्रों को औने पौने दामों पर देकर देश के युवाओं को भयंकर बेरोजगारी थमा दी। देश में इस सरकार ने अघोषित तौर पर वैज्ञानिक सोच को प्रतिबंधित कर काल्पनिक, कपोलकल्पित, आडंबर, झूठे सपनों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसका सीधा दुष्प्रभाव हमारी शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा है।

हर क्षेत्र में शैने शैने आत्मनिर्भर बनता भारत अब पूर्णतः निर्भर भारत बन रहा है। मजबूत लोकतंत्र के हर मापदंड को कमजोर कर अब विपक्ष को सम्मान देना तो दूर उसे तोड़कर, खत्म कर, विलय कर लोकतंत्र को लूटने का नंगा खेल चल रहा मकसद विपक्ष मुक्त भारत को एकदलीय व्यवस्था के अधीन लाया जाए।

विश्व पटल पर भारत की बुलंद आवाज और पकड़ अब बीते दौर की बात हुई, इस दौर में भारत की पहचान अमेरिका के पिछलग्गू की बन चुकी है, हाल के तमाम घटनाक्रम इस बात की तस्दीक करते हैं। अब ऐसे में कोई कैसे महान नेहरू और साधारण मोदी की तुलना कर सकता है?

खैर, भारत के महान लोकतंत्र को जिन चंद लोगों ने लहूलुहान किया है उसमें सबसे अग्रिम पंक्ति में वर्तमान में निरंकुश सत्ता की गोद में बैठी तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया, पैसे और पद के लिए गिरे हुए पत्तलकार, सड़ांध से बजबजाती संघी विचारधारा की पोषक मीडिया है जिसने बेवजह, बेसिर पैर की बहस को जन्म दिया।

क्या पंडित नेहरू की तुलना इस प्रधानमंत्री से की जा सकती है? पर यह महापाप किया गया है और जानबूझकर किया गया है क्योंकि इन दुष्टों को भी भलीभांति समझ है कि दोनों में कोई तुलना तो हो ही नहीं सकती पर ज्यादा समय तक कुर्सी पर रहने के कुतर्क के जरिए अपने गंवार स्वामी को नेहरू जी के ऊपर दिखाकर मालिक को खुश कर अपना निज स्वार्थ तो पूरा किया ही जा सकता है।

अरे, बीमार मानसिकता वाले गोबरभक्तों तुलना करनी है तो दोनों की शैक्षणिक योग्यता की करो, दोनों के बतौर पीएम कार्यों की सूची जारी करो, देश को बताओ नेहरू जी और उनके परिवार ने आजादी के आंदोलन हेतु क्या भूमिका निभाई वहीं मोदी के परिवार के किस सदस्य ने आंदोलन में हिस्सा लिया?

देश को बताओ कि नेहरू जी ने 198 करोड़ की संपत्ति राष्ट्र को समर्पित की थी और मोदी जी या उनके परिवार वालों ने? सनद रहे कि नेहरू जी प्रधानमंत्री रहते हुए 74 वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हो गए थे अगर वो जीवित रहते तो निश्चित ही 1967 के चुनावों के बाद भी पीएम रहते। ऐसे में मोदी जी के लिए केवल सर्वाधिक समय पीएम का रिकॉर्ड बनाने का भी केवल ख्वाब ही रहता। वैसे भी तुलना करने का काम इतिहास का है और वह हर कालखंड में अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाता आया है।

मोदी जी को सीधे नेहरू जी से तुलना की तुला में पहुंचाने वालों पहले उन्हें मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह जी, वीपी सिंह जी, चंद्रशेखर जी, एचडी देवेगौड़ा जी, और आईके गुजराल जी से तो तौल लेते फिर इनके कुल के ही अटल बिहारी वाजपेयी जी से तुलना करते। मनमोहन सिंह जी, नरसिम्हा राव जी, राजीव गांधी जी, इंदिरा गांधी जी, लाल बहादुर शास्त्री जी, पंडित जवाहर लाल नेहरू जी से तुलना तो बहुत दूर की कौड़ी है। मोदी जी के यह बारह वर्षों का कालखंड प्रत्येक भारतीय पर कहर बनकर गिरा है, सीधी बात नो बकवास। 

(परमजीत बॉबी सलूजा का लेख)

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